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सुरेख, अति कोमल, मनमोहक स्वर...... कोई भी आसानी से आकर्षित होता ऐसी आवाज़ थी वह।
दंग रह गए विजय के दिलको कोसने वाले अनगिनत विचारों को पीछे छोड़कर उसका मन उस आवाज़ पर केंद्रित हो गया।
पार्टीशन की उस ओर से वह आवाज़ आ रही थी।
*ए मालिक तेरे बंदे हम,
*ऐसे हो हमारे करम।।
वाह क्या बात थी उस आवाज में। आवाज़ नही मानो कोई कोयल की बोली हो। ना कोई वाद्य का साथ ना कोई उलझन।। सीधी सरल आवाज़....
हल्की सी आवाज़ में वह गीत शुरू हुआ। देखते ही देखते डिब्बे में से आनेवाले सभी आवाज़ मानो थम से गए हो। हर कोई उस आवाज़ को सुनने में तल्लीन हो गया। उस वक्त विजय तो भूल ही गया था कि वो रेल में है हजारों लोगों के बीच।
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वन्स मोअर...वन्स मोअर विनू!!
अच्छा! तो इस स्वर सुंदरी लता मंगेशकर का नाम विनू है! लेकिन विनू मतलब! वनिता, वंदना !! उस स्वर सुन्दरी से मिलने की विजय की इच्छा और भी तीव्र हो गई।
न चाहते हुए भी विजय दूसरों की याने विनू के दोस्तों की बातो पर गौर फरमाने लगा। बातों बातों में उसे पता चला कि वो भी बैंगलोर ही जा रही हैं। विजय मन ही मन खुश हुआ। अपने ही विचारों में खोया हुआ था कि अचानक आवाज़ आई..
"एक्सक्यूज मी! आप उठेंगे क्या।" वही आवाज़। विजय ने उपर देखा।
गोरा रंग, काली बड़ी बड़ी आंखें, नुकीली नाक, लंबे बाल। अपरिचित व्यक्ति से बात करने की वजह से चेहरे पर मिश्र भाव। एक हाथ में बेडशीट और दूसरे में तिकट।।
विजय जहा बैठा था असल में वो सीट विनु की ही थी। इसलिए विजय को वहां से उठना पड़ा। वक्त गुजरता गया और बेंगलुरु कब पहुंचे उसकी खबर ही नहीं हुई।
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विजय भोपाल का रहनेवाला था। सीधा लड़का था। इंटरव्यू के सिलसिले में बेंगलुरु आया था। इंटरव्यू दिया और सेलेक्ट भी हो गया। उसके पापा मास्टरजी थे। सबको बहुत खुशी हुई। उसकी एक छोटी बहन भी थी उसकी शादी की परवाह भी हमेशा लगी रहती थी।
दो साल बीत गए थे। विजय अपनी नोकरी में सेट हो गया था।उसके माता पिता को उसकी शादी की चिंता होने लगी थी। लेकिन विजय के मन मंदिर में तो वह स्वरागिनी ही वास करती थी। उसके पापा ने विजय से कहा,
"बेटा, हमारे स्कूल में एक लड़की है। बच्चो को पढ़ाती है। पढ़ी लिखी, सीधी साधी।। तुम्हे कोई हर्ज ना हो तो देख लो।"
बेचारा विजय अपने पापा के सामने कुछ नहीं बोल सका। बोलता भी क्या! उसे तो कहां पता था कि वो स्वरागिनी कहा रहती है ! क्या करती है ! यहां तक कि उसका नाम तक उसे ठीक से पता नहीं था। अजीब उलझन में फस गया था वह ...
एक दिन विजय सुबह सुबह अपने ऑफिस के लिए निकल रहा था। बस से जाना पड़ता था। बहुत भीड़ थी बस में। लेकिन इन महाशय को जगह तो मिल गई थी फिर किस बात की परेशानी!
अगले स्टॉप पर वही स्वरागिनी बस में चढ़ी। मानो विजय का नसीब ही खुल गया हो। लेकिन उसने चेहरे पर जाहिर नहीं होने दिया। कुछ ही पल में कुछ आवाज़ सुनाई दी। बस कंडक्टर बोल रहा था ...
"मैडम, बीस रुपए दे दीजिए नहीं तो मुझे बस को रूकाना पड़ेगा"
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विनू उससे बार बार मिन्नते कर रही थी। उसके पास सौ रुपए का नोट था। खुले पैसे नहीं थे। लेकिन बस कंडक्टर सुनने का नाम नहीं ले रहा था। विजय ने मौका देखकर पैसे दे दिए।
विनू ने विजय को थैंक्स कहा और अगले स्टॉप पर पैसे लौटाने का वादा किया। बस रुकी। उस स्वरागिनी ने बहुत कोशिश की लेकिन कुछ न हुआ। वो मायूस हो गई। विजय ने कहा...
"रहने दीजिए, कोई बात नहीं"
लेकिन वीनू एक स्वाभिमानी लड़की थी। उसे ऐसे किसी की मदद लेना पसंद नहीं था। उसने कहा...
"सुनिए महाशय, आप मुझे 5 बजे यही मिलना मै आपके पैसे लौटा दूंगी।" इतना कहकर वह चली गई।
विजय को उसकी यह अदा पसंद आई। उसका भी यही मानना था कि लड़कियों को आत्मनिर्भर होना चाहिए।
विजय को ऑफिस में काम होने की वजह से उसे पहुंचने में देर हुई। 6 बज चुके थे। विनू वहीं इंतज़ार कर रही थी। देखते ही उसने वह पैसे लौटा दिए और थैंक्स कहा।
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विजय ने भी वेलकम कहकर औपचारिकता निभाई। बात यही ख्तम हो गई थी के विजय ने स्वरागिनी को उसका नाम पूछा। उसने अपना नाम विनिता बताया। विजय को खुशी हुई। वो ऐसे ही रोज मिलने लगे। नजदीकियां बढ़ती गई।
विनिता एक गरीब लड़की थी। उसकी मां बचपन में ही गुजर गई थी। इसीलिए वह अपने मामा के घर रहती थी। दिन बीतते गए। दोनों को मोहब्बत हुई एक दूसरे से। परेशानी कि बात तो यह थी कि विजय के पापा लड़की देख चुके थे। विजय ठहरा आज्ञाकारी पुत्र। अपने पिता को वह कैसे बताए।
विजय ऑफिस से छुट्टियां लेकर भोपाल आया था कुछ दिन के लिए। तभी वो अपने पापा से अपने दिल की बात करनेवाला था। लेकिन उसे उसका मौका नहीं मिला हमेशा कुछ न कुछ हो जाता।
एक दिन सब ऐसे ही बाते करते बैठे थे कि विजय के पापा ने लड़की की फोटो दिखाई। फिर क्या था जिस बात को वह ना कहनेवाला उसी बात पर राजी हो गया। क्योंकि वह लड़की कोई और नहीं बल्कि विनिता ही थी। विजय के माता पिता भी खुश हो गए।
शादी तय हो गई। विजय की मा का कहना था कि आनेवाली बहू साथ में बहुत सा सामान और गहने लेकर आए। इसीलिए वो शादी में तरह तरह की अड़चने लाने लगी। वही विजय के पिताजी उदार स्वभाव के थे।
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सीख/निष्कर्ष:-



